आखिर क्यों
अगर किताब ही जिंदगी हैं, तो हम डिजीटल क्यो हो रहे हैं, किताबो मे ही क्यो उलझे हुए हैं,
यदि नौकरी कीवोर्ड चलाने वाले पर निर्भर हैं, तो हमें लिखना ही क्यो सिखाया जाता हैं,
यदि भारत का संविधान लिखित संभिधान है तो, सरकारी दप्तरो में टाइपिंग किये हुए पेज क्यो दिये जातै हैं,
यदि कच्चे मकान सुकून देते हैं तो हम उन्हे गिराकर पक्के क्यो बना रहे हैं,
यदि गरीब आदमी सुखी हैं, तो लोग पैसे के पीछे क्यो भाग रहे हैं,
यदि गांव में आनंद आता हैं तो लोग गांव छोड़कर शहर क्यो जा रहे हैं,
यदि बेरोजगारी बहुत ज्यादा हैं, तो काम के लिए मजदूर क्यो नही मिल रहें,
यदि सब कुछ किताबो में हैं तो ए आई क्यो ट्रेड कर रहा हैं,
यदि पेट पूजा फिर काम दूजा वाक्य सही हैं तो फिर क्यो उपवास रखा जाता हैं,
यदि सबकुछ महगा हो तो हम खरीद क्यो रहे हैं,
यदि सरकारी स्कूल के मास्टर अच्छी शिक्षा देते हैं, तो उन्ही मास्कर के बेटे उसी सरकारी स्कूल में क्यो नही पढ़ते,
यदि खेत करने में फायदा नही हैं, तो जमीन बेचने बेच क्यो नही रहें, जबकि खरीदने वाले बहुत हैं,
यदि रोड के किनारे की जमीन अच्छी होती हैं, तो लोग अपने खेतों मे से रोड क्यो नही निकलने देते,
इन सबका जवाब एक ही लोग हमें वेवकूफ बनाते हैं, सब कुछ स्थिति और समय के हिसाब से कार्य होता हैं, और उन्नति का मार्ग हमेशा सही रहता हैं,